राहुल गांधी की राजनीति या सुनियोजित भ्रम?

 राहुल गांधी की राजनीति या सुनियोजित भ्रम?

यह संयोग नही एक पेटर्न है



राष्ट्र की बात

शीतल रॉय ✍🏻


जब देश की सीमाओं पर गोलियाँ चलती हैं, तब राजधानी में शोर कर रहे शब्दों को भी जिम्मेदार होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज सेनाध्यक्ष की एक पुस्तक को लेकर ऐसा राजनीतिक तमाशा खड़ा किया जा रहा है, मानो यह कोई चुनावी घोषणा हो,और इस तमाशे के केंद्र में हैं राहुल गांधी।

सत्ताधारियों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि सेनाध्यक्ष की पुस्तक कोई राजनीतिक बयान नहीं होती। वह रणनीति, अनुभव, चेतावनी और इतिहास का दस्तावेज होती है। उसे पढ़ा जाता है, समझा जाता है, पुस्तक पर विमर्श होता है लेकिन उसे सार्वजनिक कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता...

तो सवाल सीधा है...


राहुल गांधी का उद्देश्य क्या है?

क्या वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत का सेनाध्यक्ष कमजोर है वह बिना सरकार के ऑर्डर के कोई निर्णय नही ले सकता...या भारत का प्रधानमंत्री गैर-जिम्मेदार है?

या फिर राहुल गाँधी यह संकेत देना चाहते हैं कि देश की सेना सत्ता के इशारे पर सोचती और लिखती है?

या फिर जब राहुल गांधी को राजनीतिक मुद्दों पर जमीन नहीं मिलती, तब वह राष्ट्र की सुरक्षा को ही बहस का हथियार बना लेते है ? इतिहास गवाह है 

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस नेतृत्व ने सेना और सुरक्षा जैसे विषयों को राजनीति में घसीटा हो। कभी सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल, कभी एयर स्ट्राइक पर संदेह, और अब एक पुस्तक को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर सार्वजनिक शोर। यह संयोग नहीं, यह एक पैटर्न है।

राहुल गांधी यह भली-भांति जानते हैं कि सेना भारत की सबसे भरोसेमंद संस्था है । जनता सेना पर सवाल पसंद नहीं करती और शायद इसी भरोसे को संशय में बदलने का प्रयास किया जा रहा है।

यदि पुस्तक में कोई संवेदनशील बिंदु है, तो उसके विमर्श के लिए संवैधानिक और गोपनीय प्रक्रियाएँ होती हैं, सार्वजनिक मंच नही।

लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाज़ी और सोशल मीडिया उछाल यह तरीका नहीं,यह एक राजनीतिक स्टंट है।

यहां यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कोई राजनीतिक मंच नहीं होती।

यह न विपक्ष का हथियार है,और न ही सत्ता का ढाल।

सेनाध्यक्ष कोई सरकार का एजेंट नहीं होता, वह राष्ट्र का रक्षक होता है। उसकी कलम भी उतनी ही अनुशासित होती है जितनी उसकी कमान। उसकी नीयत पर सवाल उठाना, वास्तव में सेना की निष्ठा पर हमला है।

देश यह पूछने का हक़ रखता है की...

क्या एक पुस्तक पर पूरे देश के सामने तमाशा किया जा सकता है, जब बात देश की सुरक्षा की हो?

क्या राजनीति इतनी गिर सकती है कि सेना को भी विवाद में घसीटा जाए?

आज जरूरत है स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींचने की।

 विपक्ष सरकार की आलोचना करें पूरा अधिकार है।

नीतियों पर हमला करें लोकतंत्र है।

लेकिन सेना को राजनीतिक अखाड़ा बनाना राष्ट्रद्रोही मानसिकता नहीं तो क्या है?

राहुल गांधी को यह समझना होगा कि भले ही सेना की ढाल लेकर राजनीति युद्ध आज जीत सकते हैं,

लेकिन यदि सेना की साख पर आंच आई तो सत्ता नही देश हारेगा।

और यह हार किसी दल की नहीं,भारत की होगी।

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